Monday, March 9, 2015

भगवान महावीर स्वामी

       भगवान महावीर स्वामी

अहिंसा के अवतार भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। इनका जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले गणतन्त्र वैशाली के क्षत्रिय कुण्ड़लपुर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला की यह तीसरी संतान वर्द्धमान ही बाद में विश्व में महावीर के नाम से जाने गये। 

Mahavir-Jayanti

विश्व को अंहिसा का पाठ पढ़ाने वाले भगवान महावीर को 'वीर' 'अतिवीर' और 'संमति' भी कहा जाता है। भगवान महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु में ही एकाकी दीक्षा धारण कर ली थी। भगवान महावीर जी ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु पाँच सिद्धांत बताये है। ये पांच सिद्धांत है सत्य, अंहिसा, अपरिग्रह, क्षमा और ब्रह्मचर्य। भगवान महावीर जी ने अपने प्रवचनों में इन्ही पांच मूल्यों पर सबसे अधिक जोर दिया है। भगवान महावीर द्वारा दिया गया सन्देश - ' जियो और जीने दो ' चार शब्दों में सिमटा एक ऐसा संदेश है जो सम्पूर्ण जैन धर्म का आधार बहुत ही सरलता से व्यक्त करता है। इस संदेश का अर्थ है कि आपके जीवन का उद्देश्य ऐसा होना चाहिये कि आप दूसरो को भी शांति से जीने दें और स्वंय भी शांति से जिये।
भगवान महावीर नें चतुर्विध संघ की स्थापना की। मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका इन चारों के समुदाय को चतुर्विध कहा गया है। प्रथम दो वर्ग गृहत्यागी परिव्राजको के लिए और अंतिम दो ग्रहस्थों के लिए हैं। यही उनका चतुर्विघ संघ कहलाया।

भगवान महावीर स्वामी का जीवन त्याग और तपस्या से ओत-प्रोत था। उन्होने हमेशा हिंसा, पशुबली, जाति-पाति का पुर्नजोर तरीके से विरोध किया। उनके अनुसार सत्य के पक्ष में रहते हुए भी किसी के हक को मारे बिना, किसी को सताए बिना, अपने मर्यादा में रहते हुए पवित्र मन से, लोभ लालच किए बिना, नियम से बंधकर सुख-दुख में समान आचरण करके ही दुर्लभ जीवन को सार्थक किया जा सकता है।
भगवान महावीर के प्रवचनों में त्याग, संयम, प्रेम, करुणा, शील और सदाचार का सार रहा है। देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूमकर अपना पवित्र सन्देश फैलाया। 72 वर्ष की आयु में (527 ईसापूर्व) पावापुरी में कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन भगवान महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया।
भले ही आज भगवान महावीर स्वामी हमारे बीच नही हैं लेकिन उनकी वाणी और प्रवचन आज भी लाखों मुमुक्षुओं का मार्ग दर्शन करते हैं।